ठाकुरद्वारा (मुरादाबाद), कभी जिस महिला को लॉकडाउन में अपनी गत्ता फैक्ट्री बंद होने का दंश झेलना पड़ा था, आज वही डबल एमए और बीएड. पास गार्गी रानी पूरे गांव के लिए एक ‘चलता-फिरता बैंक’ बन गई हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) से जुड़कर उन्होंने न सिर्फ खुद को आर्थिक रूप से सशक्त किया, बल्कि बुजुर्गों, मरीजों और मनरेगा मजदूरों के लिए बैंकिंग सेवाओं को उनके दरवाजे तक पहुंचा दिया है। इसके साथ ही वह ‘नमो ड्रोन दीदी’ और मशरूम उत्पादन जैसी अभिनव पहलों से जुड़कर ग्रामीण महिलाओं के लिए एक मिसाल पेश कर रही हैं।मूल रूप से बादल छल्ला (मायका) की रहने वाली गार्गी 2012 में शादी के बाद परिवार की जिम्मेदारियों में रम गई थीं। 2019 में पति की रीढ़ की हड्डी में दिक्कत के कारण वे गुरुग्राम से अपने गांव रतुपुरा (ब्लॉक व तहसील ठाकुरद्वारा) लौट आए। यहां उन्होंने एक गत्ता फैक्ट्री शुरू की, लेकिन 2020 के लॉकडाउन में वह बंद हो गई। इसी बीच उन्हें ‘बीसी सखी’ योजना के बारे में पता चला। ब्लॉक के एडीओ कमल सिंह चौहान के मार्गदर्शन में गार्गी ने अपनी गत्ता फैक्ट्री की 10 पूर्व महिला कर्मचारियों के साथ मिलकर 13 जुलाई 2020 को ‘कुंज स्वयं सहायता समूह’ का गठन किया और बीसी सखी के लिए आवेदन कर दिया।गांव वालों के लिए बनीं ‘चलता-फिरता बैंक’मुरादाबाद आरसीटी (RCT) सेंटर से एक हफ्ते का प्रशिक्षण लेने के बाद गार्गी ने पूरे रतुपुरा ग्राम पंचायत में अपनी सेवाएं देना शुरू किया। * फंडिंग और सेटअप: सरकार की ओर से उन्हें 75,000 रुपये का फंड मिला, जिसमें से 43,000 रुपये (37,000 रुपये की किट और 6,000 रुपये की फिंगरप्रिंट मशीन) इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च हुए। बाकी राशि उन्होंने लेनदेन (कैश फ्लो) के लिए रखी। *सेवाएं और बैंक: वे ‘फिनो पेमेंट बैंक’ के जरिए आधार आधारित भुगतान प्रणाली (AePS) से निकासी, जमा, डीबीटी, वृद्धावस्था पेंशन और गैस सब्सिडी जैसी सेवाएं दे रही हैं। उन्होंने गांव के 125 से 150 मनरेगा मजदूरों के नए जीरो-बैलेंस खाते खोलकर उन्हें बैंकिंग से जोड़ा विभिन्न सरकारी योजनाओं ने गार्गी को आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर बना दिया है। गांव-गांव और घर-घर जाकर लेनदेन करने पर मिलने वाले कमीशन से गार्गी प्रतिमाह औसतन 3,000 से 4,000 रुपये कमा लेती हैं। जब मनरेगा मजदूरों का भुगतान आता है या नरेगा का पेमेंट होता है, तो लेनदेन बढ़ने से यह कमाई और भी ऊपर चली जाती है।ड्रोन दीदी से बंपर कमाई: हैदराबाद से 15 दिन की ड्रोन पायलट ट्रेनिंग लेने के बाद, वह खेतों में दवा छिड़काव का काम भी करती हैं। फसलों के सीजन में वे 400 रुपये प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करती हैं। दिन भर में तीन से चार एकड़ कवर करने पर वे महीने का 20 से 25 हजार रुपये तक आसानी से कमा लेती हैं।गार्गी केवल एक केंद्र पर बैठकर काम नहीं करतीं, बल्कि आपात स्थिति में लोगों के घरों तक जाती हैं। एक भावुक वाकया साझा करते हुए उन्होंने बताया कि गांव की एक अत्यंत गरीब और बुजुर्ग महिला, जो अपनी आखिरी सांसें गिन रही थीं, उन्हें दवा के लिए पैसों की सख्त जरूरत थी। गार्गी ने रात के समय उनके घर जाकर अंगूठा लगवाकर 18,000 रुपये निकाले। वे अपने कमीशन से ज्यादा गांव वालों की दुआओं को अपनी असली कमाई मानती हैं।बहुमुखी प्रतिभा: ड्रोन दीदी और मशरूम की खेतीगार्गी की उपलब्धियां सिर्फ बैंकिंग तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने हाल ही में हैदराबाद में 15 दिनों का विशेष ड्रोन पायलट प्रशिक्षण पूरा किया है। गार्गी ने ऋण लेकर एसी प्लांट लगाया है और मशरूम की खेती कर रही हैं, जिसके लिए 8 लाख रुपये की सब्सिडी प्रक्रिया में है।ग्राम संगठन की अध्यक्ष होने के नाते उन्होंने अन्य महिलाओं को ‘महिला मेट’ बनवाया और दो अन्य महिलाओं को बीसी सखी बनने में मदद की। जरूरत पड़ने पर वे अपनी जेब से भी महिलाओं की आर्थिक मदद कर देती हैं।


